Thursday, February 3, 2011

करुणानिधि के रवैए पर कोई आश्चर्य नहीं

उसी खोटे तर्क के आधार पर, जो अपराधी व भ्रष्ट राजनीतिज्ञ तब-तब देते हैं, जब कानून की गिरफ्त में फंस जाते हैं, द्रमुक भी लाज-शर्म छोड़कर 'अपनेÓ ए. राजा के पक्ष में खड़ी हो गई है। वह तर्क यह है कि जब तक अदालत में दोष प्रमाणित न हो जाए, किसी को दोषी माना ही नहीं जा सकता। राजा की गिरफ्तारी पर गुरुवार को द्रमुक की ओर से यही बयान आया कि गिरफ्तारी से यह साबित नहीं होता कि राजा वास्तव में दोषी हैं। यह बताना भी जरूरी है कि ए. राजा द्रमुक के प्रचार सचिव के पद पर हैं। अपनी गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी के इस पद से बहुत ही 'शानÓ से इस्तीफा दिया था। फिर, द्रमुक ने बाकायदा पार्टी के शीर्ष नेताओं की बैठक की और राजा का इस्तीफा अस्वीकार कर दिया। इस 'कांडÓ का सारांश यही है कि पेरियार रामास्वामी नायकर के द्रविड़ आंदोलन के वैचारिक खेत में पैदा हुई द्रमुक को राजा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह उनके साथ है।जब देश के पूरे राजनीतिक कुएं में ही भांग पड़ी हुई है, सभी राजनीतिक दल अपने-अपने भ्रष्टों को बचाते ही हैं, तब द्रमुक से यह आशा किसी को नहीं थी कि वह राजा को निकाल बाहर कर देगी। आखिर, करुणानिधि-परिवार की 'जागीरÓ द्रमुक देश की राजनीतिक धारा से अलग कैसे हो सकती है, पर यह आशा तो थी कि यह पार्टी 'चोरी और सीनाजोरीÓ वाला रवैया तो फिलहाल नहीं ही अख्तियार करेगी। उम्मीद थी कि इस पार्टी को उतनी शर्म तो लगेगी ही, जितनी कभी-कभी बज्र-बेशर्म आदमी को भी लगने लगती है, लेकिन यह उम्मीद भी पूरी नहीं हो सकी। सुनने को यही मिला कि टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के तिल को विपक्ष ने ही ताड़ बना दिया और यह द्रमुक को बदनाम करने के लिए किया गया।यदि पौने दो लाख करोड़ का घोटाला द्रमुक और करुणानिधि के लिए 'तिलÓ के समान है, तो देश को यह सोच-सोचकर डरने का पूरा अधिकार है कि फिर इनका 'ताड़Ó कितना बड़ा होगा? जब इनके तिल के पेट में भी पौने दो लाख करोड़ समा गए हैं, तो ताड़ के पेट में तो भारत ही नहीं, बल्कि पूरा एशिया महाद्वीप भी समा जाएगा, तो भी पेट भरेगा नहीं। जनता विचार करे कि अब ऐसे 'पेटुओंÓ से छुटकारा आखिर कैसे पाया जाए? वक्त आ गया है, जब इस तर्क को शीर्षासन करा ही दिया जाए कि जब तक दोष सिद्ध नहीं होता, तब तक कोई दोषी नहीं। जनता का तर्क यह होना चाहिए कि जब तक निर्दोष साबित नहीं होते, तब तक सभी आरोपी दोषी ही हैं। क्या जनता अपना तर्क देगी भी?

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