Monday, January 31, 2011
चलती रहे मुहिम
महात्मा गांधी की 63वीं पुण्यतिथि यानी 30 जनवरी रविवार का दिन देश के लिए कुछ खास हो गया है। इस दिन धार्मिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिष्ठित नागरिकों के नेतृत्व में देश की आम जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर आई। शायद ही एक-दो बड़े शहर ऐसे रहे होंगे, जहां जनता ने सड़कों पर आकर भ्रष्टाचार का विरोध नहीं किया होगा। नागरिकों की तादाद कहीं कम, तो कहीं ज्यादा तो रही, पर इंडिया अगेंस्ट करप्शन मुहिम को प्राय: पूरे देश में समर्थन मिला। देश के सभी नागरिकों को याद रखना चाहिए कि यह मुहिम राजनीतिक नहीं है, बल्कि हम सबके अस्तित्व से जुड़ी हुई है। यदि भ्रष्टाचार मिटेगा, तो ही भारत और भारत के एक-एक नागरिक का अस्तित्व बचेगा, वरना नहीं।भ्रष्टाचार का दैत्याकार अजगर मुंह खोले पड़ा है। उसने बहुत कुछ हजम कर लिया है और यदि उसका मुंह बंद नहीं किया गया, तो वह सब कुछ चट कर लेगा। अत: नागरिक स्वयं की प्रेरणा से अपने बेशकीमती समय में से कुछ घंटे बचाकर इस मुहिम को आगे बढ़ाएं। उधर, उन लोगों को, जो आंदोलन के अगुआ हैं, याद रखना होगा कि यह मुहिम जब शुरू हो ही गई है, तो वह तार्किक निष्कर्ष तक भी पहुंचे। जाहिर है कि यह कार्य एक दिन में नहीं हो सकता। इसके लिए निरंतर वैसे ही प्रदर्शन करने पड़ेंगे और उससे बड़े-बड़े प्रदर्शन भी, जैसा रविवार को किया गया है। मुहिम की धार कुंद न पडऩे देना बहुत कठिन कार्य है। दरअसल, हमारे ये लोकतांत्रिक हुक्मरान अंग्रेजों से भी ज्यादा कुटिल हैं। ये लोग जनता की भावनाओं को समझकर सुधरेंगे नहीं, बल्कि कोशिश इस जरूरी मुहिम की हवा निकालने की ही करेंगे।हो सकता है कि ये जातिवाद का कोई मुद्दा उछाल दें और परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार के विरुद्ध लामबंद होती जनता बंट जाए। क्षेत्र, भाषा और संप्रदायवाद जैसे हथकंडे भी आजमाए जा सकते हैं, तो हो सकता है कि कोई राजनीतिक जमात इस मुहिम में प्रवेश कर जाए और इसकी पूरी धारा ही बदल दे। यानी, इस मुहिम को बुरी नजर से बचाकर तार्किक परिणति तक पहुंचाने का जिम्मा इस मुहिम के नेताओं पर ही है। इसलिए कि देश के नागरिकों का एक बड़ा वर्ग राजनीतिज्ञों के झांसे में आसानी से फंस जाता है। कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की यह लड़ाई उससे कहीं ज्यादा कठिन है, जो देश ने बापू के नेतृत्व में अंग्रेजों से लड़ी थी। आशा है कि जो लड़ाई शुरू हो गई है, वह भ्रष्टाचार के समूल नाश के बाद ही खत्म होगी। आमीन...।
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