Thursday, February 3, 2011

आतंकियों के खिलाफ नहीं उठती आवाज

मानवता के लिहाज से देखें, तो घटना बहुत बड़ी है, पर यदि आंकड़ों के लिहाज से देखें, तो छोटी-सी ही। उस जम्मू कश्मीर के लिए तो खासतौर पर, जो पिछले तीन दशक से आतंकवाद का दंश भोग रहा है। इसके बावजूद, यह घटना कहती तो बहुत कुछ है। बीते रोज सोपोर में आतंकवादियों ने एक मजदूर परिवार की दो मासूम बेटियों को मौत के घाट उतार दिया और फिर आतंकी बेखौफ होकर हथियार लहराते चले गए। इन मासूमों के जनाजे में शामिल लोग छाती तो पीट रहे थे, पर उनके मुंह पर ताले भी जड़े हुए थे। जनाजे में शामिल भीड़ में एक भी जुबां ऐसी नहीं थी, जो आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही हो। यह चुप्पी तब थी, जब पूरे सोपोर शहर को पता था कि दरिंदे कौन थे। दरअसल, आतंकवादी उसी मजदूर परिवार के पड़ौसी व परिचित थे, जिसकी दो मासूम बच्चियां मौत के घाट उतार दी गई थीं। यही कारण था कि पुलिस ने तो आतंकवादियों की तत्काल ही शिनाख्त कर ली थी, पर पूरा सोपोर शहर और पूरी कश्मीर घाटी उन आतंकियों से अनजान होने का नाटक करती रही।ऐसा क्यों? फिलहाल तो इसके सिर्फ दो ही कारण समझ में आते हैं। या तो सोपोरवासियों को आतंकवादियों का खौफ रहा होगा या फिर उनके प्रति समर्थन का भाव। वरना, इसकी और क्या वजह हो सकती है कि लोग जान-बूझकर अनजान बन गए और आतंकवादियों के खिलाफ कोई गुस्सा तो भड़का ही नहीं, किसी ने यह पूछने की जहमत भी नहीं उठाई कि उन बच्चियों का कसूर क्या था कि उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया? यह वही कश्मीर है, जहां पुलिस को अगर छींक भी आ जाती है, तो उपद्रव हो जाता है। मगर, आतंकियों की हैवानियत पर यदि कहीं किसी ने उफ भी नहीं की, तो सवाल भी उठेंगे ही। सोपोरवासियों का यह रवैया आतंकवादियों के हौसले ही बुलंद करेगा।

करुणानिधि के रवैए पर कोई आश्चर्य नहीं

उसी खोटे तर्क के आधार पर, जो अपराधी व भ्रष्ट राजनीतिज्ञ तब-तब देते हैं, जब कानून की गिरफ्त में फंस जाते हैं, द्रमुक भी लाज-शर्म छोड़कर 'अपनेÓ ए. राजा के पक्ष में खड़ी हो गई है। वह तर्क यह है कि जब तक अदालत में दोष प्रमाणित न हो जाए, किसी को दोषी माना ही नहीं जा सकता। राजा की गिरफ्तारी पर गुरुवार को द्रमुक की ओर से यही बयान आया कि गिरफ्तारी से यह साबित नहीं होता कि राजा वास्तव में दोषी हैं। यह बताना भी जरूरी है कि ए. राजा द्रमुक के प्रचार सचिव के पद पर हैं। अपनी गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी के इस पद से बहुत ही 'शानÓ से इस्तीफा दिया था। फिर, द्रमुक ने बाकायदा पार्टी के शीर्ष नेताओं की बैठक की और राजा का इस्तीफा अस्वीकार कर दिया। इस 'कांडÓ का सारांश यही है कि पेरियार रामास्वामी नायकर के द्रविड़ आंदोलन के वैचारिक खेत में पैदा हुई द्रमुक को राजा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह उनके साथ है।जब देश के पूरे राजनीतिक कुएं में ही भांग पड़ी हुई है, सभी राजनीतिक दल अपने-अपने भ्रष्टों को बचाते ही हैं, तब द्रमुक से यह आशा किसी को नहीं थी कि वह राजा को निकाल बाहर कर देगी। आखिर, करुणानिधि-परिवार की 'जागीरÓ द्रमुक देश की राजनीतिक धारा से अलग कैसे हो सकती है, पर यह आशा तो थी कि यह पार्टी 'चोरी और सीनाजोरीÓ वाला रवैया तो फिलहाल नहीं ही अख्तियार करेगी। उम्मीद थी कि इस पार्टी को उतनी शर्म तो लगेगी ही, जितनी कभी-कभी बज्र-बेशर्म आदमी को भी लगने लगती है, लेकिन यह उम्मीद भी पूरी नहीं हो सकी। सुनने को यही मिला कि टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के तिल को विपक्ष ने ही ताड़ बना दिया और यह द्रमुक को बदनाम करने के लिए किया गया।यदि पौने दो लाख करोड़ का घोटाला द्रमुक और करुणानिधि के लिए 'तिलÓ के समान है, तो देश को यह सोच-सोचकर डरने का पूरा अधिकार है कि फिर इनका 'ताड़Ó कितना बड़ा होगा? जब इनके तिल के पेट में भी पौने दो लाख करोड़ समा गए हैं, तो ताड़ के पेट में तो भारत ही नहीं, बल्कि पूरा एशिया महाद्वीप भी समा जाएगा, तो भी पेट भरेगा नहीं। जनता विचार करे कि अब ऐसे 'पेटुओंÓ से छुटकारा आखिर कैसे पाया जाए? वक्त आ गया है, जब इस तर्क को शीर्षासन करा ही दिया जाए कि जब तक दोष सिद्ध नहीं होता, तब तक कोई दोषी नहीं। जनता का तर्क यह होना चाहिए कि जब तक निर्दोष साबित नहीं होते, तब तक सभी आरोपी दोषी ही हैं। क्या जनता अपना तर्क देगी भी?

Tuesday, February 1, 2011

मिस्र में लोकतंत्र आने की कोई संभावना नहीं

ट्यूनीशिया के बाद मिस्र में हो रही क्रांति को पश्चिम ही नहीं, भारत का मीडिया भी यूं पेश कर रहा है, मानो अरब जगत में लोकतंत्र का सूर्योदय होने ही वाला है। तानाशाही से ग्रस्त व बहुत हद तक धार्मिक शासन के चंगुल में फंसे इन देशों में लोकतंत्र यदि आता है, तो इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया बेहतर ही होगी, पर ट्यूनीशिया, मिस्र या किसी और अरब देश में लोकतंत्र आएगा ही, इस पर तो संदेह ही है। दरअसल, दुनिया के सभी मुस्लिम देशों में चार तरह की शासन-प्रणाली ही प्रचलित है। एक-धार्मिक कट्टरता सहित तानाशाही। ऐसे देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता, जैसे-सऊदी अरब। दो-धार्मिक कट्टरता सहित लोकतंत्र। ऐसे देशों में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को कोई नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं होता, जैसे-ईरान।तीन-धार्मिक कट्टरता रहित तानाशाही। ऐसे देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार मिले होते हैं। मिस्र-ट्यूनीशिया आदि ऐसे ही देश हैं। चार-धार्मिक कट्टरता रहित लोकतंत्र। ऐसे देशों में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार मिले होते हैं, पर धार्मिक संगठन समय-समय पर उनके अधिकार बाधित करते रहते हैं, क्योंकि इन देशों की व्यवस्था स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष नहीं होती, जैसे-बांग्लादेश। इतिहास बताता है कि जब शेख हसीना यहां की सत्ता में रहती हैं, तो व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष होना पड़ता है, पर खालिदा जिया के शासनकाल में वही व्यवस्था कट्टरता को हवा देने लगती है। यानी, वह स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष नहीं है। तीन मुस्लिम देश इस नियम के अपवाद भी हैं-इंडोनेशिया, तुर्की और मलेशिया। वैसे अब इंडोनेशिया में भी कट्टरपंथियों ने अपनी पकड़ बना ली है, तो हालात तुर्की के भी बदल रहे हैं।ऐसे में यदि कोई यह कहे कि ट्यूनीशिया या मिस्र की क्रांति लोकतंत्र के लिए है, तो बात जरा जंचती नहीं। मिस्र की जनता हुस्नी मुबारक के खिलाफ क्यों है? इसके बड़े कारण तो गरीबी, भुखमरी और भ्रष्टाचार ही हैं, पर इसका एक कारण और भी है। मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी कट्टरपंथी पार्टियां मुबारक से इसलिए नाराज हैं कि वे अमेरिका और इजरायल के समर्थक हैं तथा उन्होंने ईसाइयों को कुछ ज्यादा ही अधिकार दे दिए हैं। मिस्र की सेना का रुख भी धर्मनिरपेक्ष नहीं माना जाता। अव्वल तो ये सभी ताकतें मिस्र में लोकतंत्र आने नहीं देंगी और दूसरे, आया भी तो वह ईरान जैसा ही होगा। अत: न तो पश्चिम को खुश होना चाहिए और न ही भारत को। अभी तो तेल देखो और तेल की धार।