Tuesday, February 1, 2011
मिस्र में लोकतंत्र आने की कोई संभावना नहीं
ट्यूनीशिया के बाद मिस्र में हो रही क्रांति को पश्चिम ही नहीं, भारत का मीडिया भी यूं पेश कर रहा है, मानो अरब जगत में लोकतंत्र का सूर्योदय होने ही वाला है। तानाशाही से ग्रस्त व बहुत हद तक धार्मिक शासन के चंगुल में फंसे इन देशों में लोकतंत्र यदि आता है, तो इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया बेहतर ही होगी, पर ट्यूनीशिया, मिस्र या किसी और अरब देश में लोकतंत्र आएगा ही, इस पर तो संदेह ही है। दरअसल, दुनिया के सभी मुस्लिम देशों में चार तरह की शासन-प्रणाली ही प्रचलित है। एक-धार्मिक कट्टरता सहित तानाशाही। ऐसे देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता, जैसे-सऊदी अरब। दो-धार्मिक कट्टरता सहित लोकतंत्र। ऐसे देशों में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को कोई नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं होता, जैसे-ईरान।तीन-धार्मिक कट्टरता रहित तानाशाही। ऐसे देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार मिले होते हैं। मिस्र-ट्यूनीशिया आदि ऐसे ही देश हैं। चार-धार्मिक कट्टरता रहित लोकतंत्र। ऐसे देशों में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार मिले होते हैं, पर धार्मिक संगठन समय-समय पर उनके अधिकार बाधित करते रहते हैं, क्योंकि इन देशों की व्यवस्था स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष नहीं होती, जैसे-बांग्लादेश। इतिहास बताता है कि जब शेख हसीना यहां की सत्ता में रहती हैं, तो व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष होना पड़ता है, पर खालिदा जिया के शासनकाल में वही व्यवस्था कट्टरता को हवा देने लगती है। यानी, वह स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष नहीं है। तीन मुस्लिम देश इस नियम के अपवाद भी हैं-इंडोनेशिया, तुर्की और मलेशिया। वैसे अब इंडोनेशिया में भी कट्टरपंथियों ने अपनी पकड़ बना ली है, तो हालात तुर्की के भी बदल रहे हैं।ऐसे में यदि कोई यह कहे कि ट्यूनीशिया या मिस्र की क्रांति लोकतंत्र के लिए है, तो बात जरा जंचती नहीं। मिस्र की जनता हुस्नी मुबारक के खिलाफ क्यों है? इसके बड़े कारण तो गरीबी, भुखमरी और भ्रष्टाचार ही हैं, पर इसका एक कारण और भी है। मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी कट्टरपंथी पार्टियां मुबारक से इसलिए नाराज हैं कि वे अमेरिका और इजरायल के समर्थक हैं तथा उन्होंने ईसाइयों को कुछ ज्यादा ही अधिकार दे दिए हैं। मिस्र की सेना का रुख भी धर्मनिरपेक्ष नहीं माना जाता। अव्वल तो ये सभी ताकतें मिस्र में लोकतंत्र आने नहीं देंगी और दूसरे, आया भी तो वह ईरान जैसा ही होगा। अत: न तो पश्चिम को खुश होना चाहिए और न ही भारत को। अभी तो तेल देखो और तेल की धार।
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